HomeHindi Storyपंचतंत्र: कुम्हार की कथा

पंचतंत्र: कुम्हार की कथा

Panchtantra The Potter Story In Hindi

सालों पहले की बात है। एक गांव में युधिष्ठिर नाम का एक कुम्हार रहा करता था। दिन में वह मिट्टी के बर्तन बनाता था और जो भी पैसे मिलते थे, उनसे शराब खरीद कर पी लेता। उसके मित्र हमेशा उसे समझाते की इतनी अधिक शराब पीना सही नहीं हैं, पर वह किसी की नहीं मानता था।

रोज की तरह एक रात वह शराब के नशे में अपने घर लौट रहा था। वह इतना नशे में था कि ठीक से चल भी नही पा रहा था। अचानक उसका पैर लड़खड़ाया और वह जमीन पर गिर पड़ा। जमीन पर कांच के टुकड़े पड़े थे, जिनमें से एक टुकड़ा उसके माथे में घुस गया।

उसके माथे से खून बहने लगा। इसके बाद कुम्हार किसी तरह उठा और अपने घर की ओर चल दिया। अगले दिन वह चिकित्सक के पास गया, और पट्टी करवाकर दवाई ली। चिकित्सक ने कहा, “घाव गहरा होने के कारण इसे भरने में समय लगेगा।

युधिष्ठिर ने फिर भी शराब पीना नहीं छोड़ा। कुछ समय के बाद एक साल उसके गांव में सूखा पड़ गया। सभी लोग गांव छोड़ कर दूसरे राज्य जाने लगे। कुम्हार ने भी गांव छोड़ कर जाने का फैसला किया और दूसरे देश की तरफ निकल गया।

पड़ोसी देश का राज्य बहुत दयालु था, राजा अधिक से अधिक लोगों को नौकरी पर रख रहा था, राजा ने जब युधिष्ठिर के माथे पर चोट का निशान देखा और सोचा, यह जरूर यह कोई पराक्रमी योद्धा होगा और दुश्मन से लड़ते समय इसके माथे पर चोट लगी होगी।

यह सोचकर राजा ने उसे अपनी सेना में एक खास जगह दे दी और उस पर विशेष ध्यान देने लगे। यह देख कर राजा के दरबार में मौजूद दरबारी,  सेनापति उससे जलने लगे।

एक दिन शत्रुओं ने राजा के महल पर हमला कर दिया। राजा ने अपनी पूरी सेना को युद्ध के लिए तैयार किया। उसने युधिष्ठिर से भी युद्ध में जाने के लिए कहा। युधिष्ठिर जब युद्ध भूमि की तरफ जा रहा था तो राजा ने उससे पूछा कि उसके माथे पर यह चोट किस युद्ध में लगी।

इसपर युधिष्ठिर ने सोचा कि अगर अब वह राजा को बात देगा तो कोई समस्या नहीं होगी। यह सोच कर उसने राजा ने कहा, “राजन, मैं कोई योद्धा नहीं हूं। मैं तो एक साधारण-सा कुम्हार हूं। यह चोट मुझे किसी युद्ध में नहीं, बल्कि शराब पीकर गिरने के कारण लगी थी।”

कुम्हार की यह बात सुनकर राजा को बहुत गुस्सा आया। उसने कहा, “तुमने मेरा विश्वास तोड़ा है और मुझे छल कर दरबार में इतना ऊंचा पद पाया है। मैंने तुम्हें क्या समझ ओर तुम क्या निकले, अगर तुम मुझे तभी सच बात देते तो मैं तुम्हें सेना का पूरा प्रशिक्षण दिलाता।

अब हम निकल जाओ मेरे राज्य से।” कुम्हार ने राजा से बहुत मिन्नतें की, उसने कहा कि अगर उसे मौका मिले, तो वह युद्ध में राजा के लिए प्राण भी दे सकता है।

राजा ने कहा, “तुम चाहे जितने भी वीर और पराक्रमी हो, लेकिन तुम शूरवीरों के कुल से नहीं हो। तुम्हारी हालत शेरों के बीच रहने वाले उस गीदड़ की तरह है, जो हाथी से लड़ने की जगह उससे दूर भागने की बात करता है। राजा ने कहाँ, जब तुम्हारे अंदर सच बोलने का ही साहस नहीं हैं तो तुम शत्रु से क्या युद्ध करोगे।

मैं तुम्हे जाने दे रहा हूं, लेकिन अगर राजकुमारों को तुम्हारा राज पता चल गया, तो वो तुम्हें मार डालेंगे। कुम्हार ने राजा की बात मानी और तुरंत उस राज्य को छोड़ कर चला गया।

कहानी से सीख

इस कहानी से यह सीख मिलती है कि हमे झूठ का सहारा लेकर आगे नहीं बड़ना चाहिए।, एक न एक दिन झूठ सबके सामने आ ही जाता हैं।

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